तिथि एवं उनका महत्व एवं निषिद्ध वस्तु या कार्य
प्रतिपदा (एकम ) : धार्मिक अनुष्ठान के लिए उत्तम तिथि ( अधिपति देव : अग्नि देव )
।। ऊँ महाज्वालाय विद्महे अग्नि मध्याय धीमहि , तन्नो: अग्नि प्रचोदयात ।।
प्रतिपदा को कूष्माण्ड (कुम्हड़ा, पेठा) न खाएं क्योंकि यह धन का नाश करने वाला है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंड: 27.29-34)
द्वितीया ( दौज ) : नव निर्माण शुरू करने के लिए उत्तम तिथि ( अधिपति देव : ब्रह्मा जी )
॥ ॐ चतुर्मुखाय विद्महे, कमण्डलु धाराय धीमहि, तन्नो ब्रह्म प्रचोदयात् ॥
दौज को बृहती (छोटा बैगन या कटेहरी) खाना निषिद्ध है (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34)
तृतीया ( तीज ) : मुंडन आदि कार्यों के लिए उत्तम तिथि ( अधिपति देवी : माता गौरी )
।। या देवी सर्वभूतेषु मां गौरी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
तृतीया को परवल खाना शत्रुओं की वृद्धि करने वाला है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंड: 27.29-34)
चतुर्थी ( चौथ ) : बाधा दूर करने के लिए उत्तम तिथि ( अधिपति देव : श्री गणेश जी और यमदेव )
वक्रतुण्ड महाकाय सुर्यकोटि समप्रभ निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा
धर्मराज नमस्तुभ्यं नमस्ते यमुनाग्रज।
चतुर्थी को मूली खाने से धन का नाश होता है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंड: 27.29-34)
पंचमी ( पांचे ) : सर्जरी / चिकित्सा आदि के लिए उत्तम तिथि ( अधिपति देव : नागदेव )
नमोस्तु सर्पेभ्यो ये के च पृथ्वीमनु। येऽ अंतरिक्षे ये दिवितेभ्य: सर्पेभ्यो नम:।।
पंचमी को बेल खाने से कलंक लगता है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंड: 27.29-34)
षष्टी ( छठ ) : उत्सव मनाने के लिए उत्तम तिथि ( अधिपति देव : कार्तिकेय )
ॐ तत्पुरुषाय विधमहे: महा सैन्या धीमहि तन्नो स्कंदा प्रचोदयात'
षष्ठी को नीम की पत्ती, फल या दातुन मुंह में डालने से नीच योनियों की प्राप्ति होती है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंड: 27.29-34)
सप्तमी ( सातै) : खरीददारी / यात्रा शुरू करने के लिए उत्तम तिथि ( अधिपति देव : सूर्य देव )
ॐ हृां मित्राय नम:
ॐ हृीं रवये नम:
ॐ हूं सूर्याय नम:
ॐ ह्रां भानवे नम:
ॐ हृों खगाय नम:
ॐ हृ: पूषणे नम:
ॐ ह्रां हिरण्यगर्भाय नमः
ॐ मरीचये नमः
ॐ आदित्याय नमः
ॐ सवित्रे नमः
ॐ अर्काय नमः
ॐ भास्कराय नमः
सप्तमी को ताड़ फल खाने से रोग बढ़ता है तथा शरीर का नाश होता है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंड: 27.29-34)
अष्टमी ( आठै ) : जीत दिलाने के लिए उत्तम तिथि , केवल कृष्ण पक्ष में पूजा लाभ कारी होगी , शुक्ल पक्ष में वर्जित ( अधिपति देव : रूद्रदेव )
।। ॐ नमो भगवते रुद्राय ।।
अष्टमी को नारियल फल खाने से बुद्धि का नाश होता है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंड: 27.29-34)
नवमी ( नौमी ) : युद्ध शुरुआत के लिए उत्तम तिथि ( अधिपति देवी : अम्बिका )
।। ह्रीं श्री अम्बिकायै नम: ।।
नवमी को लौकी खाना गोमांस के समान त्याज्य है - ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34
दशमी : धार्मिक / आध्यात्मिक कार्यों के लिए उत्तम तिथि ( अधिपति देव : धर्मराज )
।। ऊँ धर्मराजाय नम: ।।
दशमी को कलंबी का शाक खाना त्याज्य है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंड: 27.29-34)
एकादशी ( ग्यारस ) : पूजा / व्रत / धर्मस्थान यात्रा / दान आदि के लिए उत्तम तिथि ( अधिपति देव : महादेव )
एकादशी व्रत के पुण्य के समान और कोई पुण्य नहीं है । जो पुण्य गौ-दान सुवर्ण-दान, सूर्यग्रहण में दान, अश्वमेघ यज्ञ से होता है, उससे अधिक पुण्य एकादशी के व्रत से होता है | एकादशी के व्रत से कीर्ति बढ़ती है, श्रद्धा-भक्ति बढ़ती है, धन-धान्य, पुत्रादि की वृद्धि होती है | एकादशी करनेवालों के पितर नीच योनि से मुक्त होते हैं ।
।।ॐ नम: शिवाय।।
।। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्धनान्मृ त्योर्मुक्षीय मामृतात् ।।
एकादशी को शिम्बी (सेम) खाने से पुत्र का नाश होता है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंड: 27.29-34)
द्वादशी : धार्मिक अनुष्ठान के लिए उत्तम तिथि ( अधिपति देव : भगवान विष्णु )
सच्चिदानंदरूपाय विश्वोत्पत्यादिहेतवे |
तापत्रयविनाशाय श्रीकृष्णाय वयं नुमः ||
ॐ नारायणाय विद्महे। वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णु प्रचोदयात्।।
एकोऽपि कृष्णस्य कृतः प्रणामो दशाश्वमेधावभृथेन तुल्यः ।
दशाश्वमेधी पुनरेति जन्म कृष्णप्रणामी न पुनर्भवाय ॥
- महाभारत, शान्तिपर्व॰ ४७/९२
एको हि कृष्णस्य कृतः प्रणामो दशाश्वमेधावभृथेन तुल्यः ।।
दशाश्वमेधी पुनरेति जन्म कृष्णप्रणामी न पुनर्भवाय ।। ६-३ ।।
- नारदपुराण , उत्तरार्ध, ६/३
एकोऽपि गोविन्दकृतः प्रणामः शताश्वमेधावभृथेन तुल्यः ।।
यज्ञस्य कर्त्ता पुनरेति जन्म हरेः प्रणामो न पुनर्भवाय ।।
- स्कन्दपुराण, वैष्णवखण्ड
अर्थात ... भगवान् श्रीकृष्ण की शरण में जाना तो. दस अश्वमेघ यज्ञों के अन्त में किये गये दिव्य स्नान के समान फलदायक होता है। दस अश्वमेघ करने वाला तो संसार के बन्धनों (आवागमन) से मुक्त भी नहीं होता है, परंतु श्री कृष्ण की शरण में जाने वाला संसार के बन्धनों से मुक्त हो जाता है ।
द्वादशी को पूतिका (पोई) खाने से पुत्र का नाश होता है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंड: 27.29-34)
त्रयोदशी ( तेरस) : प्रेम / प्यार / मित्रता के लिए उत्तम तिथि ( अधिपति देव : कामदेव )
।। ऊँ कामदेवाय विद्महे, रति प्रियायै धीमहि, तन्नो अनंग प्रचोदयात् ।।
त्रयोदशी को बैंगन खाने से पुत्र का नाश होता है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंड: 27.29-34)
चतुर्दशी ( चौदस ) : प्रेत बाधा दूर / सिद्धि प्राप्त करने के लिए उत्तम तिथि ( अधिपति देवी : काली मैय्या )
।। ॐ क्रीं कालिकायै नमः ।।
चतुर्दशी को स्त्री - सहवास तथा तिल का तेल खाना व लगाना निषिद्ध है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंड: 27.29-34)
अमावस्या ( मावस ) : पितृ पूजन / पिंड दान / दान धर्म आदि के लिए उत्तम तिथि ( अधिपति देव : पितृदेव )
।। ॐ पितृगणाय विद्महे जगत धारिणी धीमहि तन्नो पितृो प्रचोदया ।।
अमावस्या के दिन स्त्री - सहवास तथा तिल का तेल खाना और लगाना निषिद्ध है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंड: 27.29-34)
पूर्णिमा ( पूर्णमासी ) : व्रत / यज्ञ / कथा आदि के लिए उत्तम तिथि ( अधिपति देव : चन्द्रमा )
।। ॐ सों सोमाय नम:।।
पूर्णिमा के दिन स्त्री - सहवास तथा तिल का तेल खाना और लगाना निषिद्ध है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंड: 27.29-34)
~~~~~~~~~~~~~~~~~~
महत्वपूर्ण बातें
क्या आप जानते है ? पांडवों ने ये 5 गांव कौरवो से मांगे थे - पांडुप्रस्थ (पानीपत), स्वर्णप्रस्थ (सोनीपत) , व्याघ्रप्रस्थ (बागपत), वारणावर्त (बरनावा , हिण्डन/, यहाँ लाक्षागृह बनाया था ) और वरुपत (तिलपत , फरीदाबाद)
*****
क्या आप जानते है ? , ईशान कोण में तुलसी का पौधा लगाने से तथा पूजा के स्थान पर गंगाजल रखने से घर में लक्ष्मी की वृद्धि होती है | घर के अंदर, लक्ष्मी जी बैठी हों ऐसा फोटो रखना चाहिए और दुकान के अंदर, लक्ष्मी जी खड़ी हों ऐसा फोटो रखना चाहिए
*****
।। अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता । अस बर दीन्ह जानकी माता ।। - तुलसीदास जी (श्री हनुमान चालीसा)
आठ सिद्धियाँ इस प्रकार हैं :- (1) अणिमा (2) महिमा (3) गरिमा (4) लघिमा (5) प्राप्ति (6) प्राकाम्य (7) वशित्व (8) ईशित्व ।
आठ सिद्धियों के प्राप्ति फल के बारे में जानने के लिए नीचे क्लिक करें
अष्ठ सिद्धि प्राप्ति फल
नौ निधियां इस प्रकार है :- (1) पद्म निधि (2) महाप निधि (3) मकर निधि (4) कच्छप निधि (5) मुकुन्द निधि (6) कुन्द (नन्द) निधि (7) नील निधि (8) शंख निधि (9) मिश्र निधि
~~~~~~~
10 इन्द्रियां एवं उनके स्वामी
पांच ज्ञानेंद्रियां एवं उनके देवता
चक्षु (नेत्र) : भास्कर (सूर्य )
कर्ण (कान) : आकाश (दिशा )
नासिका (नाक) : पृथ्वी ( अश्वनी कुमार )
रसना (जिह्वा ) : वरुण (जल )
त्वक (चर्म/खाल/त्वचा ) : वायु ( पवन )
पांच कर्मेंद्रियां एवं उनके देवता
हस्त (हाथ ) : इंद्र
चरण : उपेंद्र ( विष्णु )
वाणी (मुँह ) : अग्नि
उपस्थेन्द्रिय / लिंग (लघुशंका इंद्री ) : प्रजापति
पायु /गुदा (निव्रतेंद्री ) : यमराज (मृत्यु)
*****
संकलनकर्ता - रमेश खोला , 06.05.2022
~~~~~~~~~~~~~~~~~~
No comments:
Post a Comment
नमस्कार दोस्तो ,
आप, प्रतिक्रिया (Feedback) जरूर दे, ताकि कुछ कमी/गलती होने पर वांछित सुधार किया जा सके ताकि पोस्ट की गयी सामग्री/कंटेंट आपके लिए उपयोगी हो सके और मुझे इससे भी अच्छे कंटेंट डालने के लिए प्रोत्साहन मिल सके, इसके साथ साथ यहाँ पोस्ट की गयी सामग्री / कंटेंट को आप अपने स्तर पर जाँच ले :- आपका अपना साथी - रमेश खोला